रात की बात

 शादी को कुछ वक़्त ही हुआ, खुद ही से बात कर ही रही थी की ख्याल आया...अब तो सुधर जा यार शादी हो गई है तेरी, आखिर कब तक हर चीज से बात करेगी! पीछे मुड़ी तो सासू मां खड़ी थी, एक बैग के साथ और बोली, " हम जा रहे है बाहर, तुम और हरमन ही हो अब घर पे दो दिन के लिए।" 

वो मुस्कुराई और चली गई! अजीब  लगा कुछ पर फिर दरवाजा बंद करके अपने काम में व्यस्त हो गई। 

कुछ देर बाद फोन की घंटी बजी...

(हरमन कॉलिंग...)

मैं : अच्छा हुआ आप ने कॉल कर ली, खाने में क्या बनाओ ममी और पापा तो बुआ जी के घर पे गए है और...


वो: (*मेरी  बात बीच में काटते हुए) हां हां पता है। तुम खाने की चिंता छोड़ो और अभी मैंने तुम्हारे लिए दो ब्यूटीशियन घर पे भेजवाई है ड्रेस के साथ रात को मिलते खाना मैं ले आऊंगा तुम बस तैयार रहना। (* ये कहते ही उसने फोन काट दिया)


मैं कुछ इस से पहले कहती या करती की दरवाजे की घंटी बजी और दो औरतें, पूरी तरह से ड्रेस अप मेरे सामने खड़ी थी...


मैं बोल पड़ी," जी देखिए आप ड्रेस दे दीजिए मैं कोई और सर्विस नही चाहती।" 


और उनमें से एक ने अपना फोन मुझे दिया और बोली आप के लिए इस में वाइस नोट है। सुना  तो पता लगा हरमन है, " सुनो तुम प्लीज टाइम मत वेस्ट करना बाते बहुत है और टाइम कम जैसे इनको ऑर्डर है वैसे करने देना और आराम से तैयार हों जाना। " 


मैं ने उसे फोन पकड़ाया और हरमन को फोन लगाया, " हद है यार मैं नही चाहती ये सब क्यों जबरदस्ती कर रहे हो?" 


वो: क्योंकी मैं चाहता हो की तुम आराम करो जब तक मैं ना आओ और जब मैं आ जाऊंगा तो आराम क्या सांस भी नही लेने दूंगा। (* ये कह कर वो जोर से हंसा)

और फिर क्या था मैं यहां बैठी हु पैक मुंह पर, खीरा आंखों पर और दिमाग में बातो के साथ। कही आज वो रात तो नही, नही मैं तैयार नहीं हूं और इन्होंने तो बोला था की पहले दोस्ती करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे! क्या है ये सब, और उन्होंने सब कर दिया कुछ एक या दो घंटो में। 


अब  ड्रेस देखने का वक्त था, और ये तो पजामा और t shirt है! मुझे तो लगा की... चलो ये ठीक ही है, अच्छा है बल्कि मैं काफी हल्का महसूस कर रही हूं। 


थोड़ी  ही देर में हरमन आ गए। आते ही मेरा माथा चूम कर बोले,

" आज चांद में सूरज दिख रहा है, अब दो प्लेट ले कर मुझे छत पर मिलो।" 

और खाना हाथ में लिए वो छत पे चले गए। अभी एक डर बना हुआ है मन में अगर आज वो रात है तो क्या करो! 


डरते  डराते छत पे पहुंच गई, कदम रखते ही देखा एक प्रोजेक्टर लगा हुआ था। मच्छरदानी के अंदर खाना पड़ा है पर हरमन कहा गए? 


तभी मेरा हाथ थाम लिया और बोले, " दोस्ती करनी है तुमसे क्या मेरी दोस्त बनोगी अमन ? "


क्या कहती  बस हां में गर्दन हिला दी। डर कही नही है अब हम ने खाना खाया और उसके बाद प्रोजेक्टर पे फिल्म भी देखी यही कुछ तीन शायद और ढेर सारी बातें बेफिक्री से भरी, अब सुबह के तीन बजे है और हम एक दूसरे को देखते हुए सोने की सोच रहे है। सच में इस रात की बात ने मुझे एक साथी दे दिया है।

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अंतः

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