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कवि की पत्नी (लघु कथा)

 आज भी याद है बहुत खुश हुई थी मैं, जब पता लगा था की ये कविता लिखते है। दिल को लगा चलो अब कभी ना कभी मुझ पर भी कविता लिखी जाएगी।  दिखने में भी अच्छे और ऊपर से कवि साथ की साथ कॉलेज के प्रोफेसर। सब सहेलियों में से मान लिया था की भगवान ने मेरे व्रत का सही जवाब दिया है। शुरू के दिनों में तो यू लगता था की हो सकता है, शर्मीले है इसलिए अभी तक कुछ ना लिख पाए मुझ पर, आज शादी की सालगिराह है, दिखती हूं आज भी याद दिलाना पड़ेगा या याद होगा जो की मुश्किल है। ख्वाब था अब ज़िन्दगी की सुबह देखी तो पता लगा की कवि की पत्नी बनने से भी कविता तुम पर नही बनती! अजीब कभी कभी लगता है की प्यार ही नही करते, पर दिमाग तभी वो दिन याद दिला देता जिस दिन इन से पहली मुलाकात हुई थी। तब तो पता भी न था की इन्ही से शादी बात चल रही है, और इन्हें खूब सुना दिया की पीछा कर रहे हो! जब की ये अपने पिता जी के पास आए थे, हमारे घर ही। पर जो भी हो आज तो कवि साहिब से कविता बनावा के ही रहूंगी। इतने में ही... (ये उठ गए) "निर्मल चाय मिलेगी फिर बाहर सैर करने जाऊंगा, आज का दिन खास है तो घर पर रहूंगा। " (मन ही मन लड्डू फोटे मेरे ...